कलमबाज़......
भारत में जैसे जैसे चुनाव करीब आने लगते हैं, चुनाव चाहे संसदीय हों या फिर राज्यस्तरीय, राजनीतिक दलों की पैंतरे बाज़ियाँ शुरू हो जाती हैं। लगभग सभी दल अपने अपने स्तर से जनता को लुभाने के प्रयास करना आरंभ कर देते हैं। हर नेता अपने नित नए बयानों एवं हरकतों के माध्यम से जनता को कुछ न कुछ संदेश देता नज़र आता है।
जब से भाजपा सत्ता में आई है राजनीति एक इवैंट बन कर रह गई है। सबसे पहले मैं यह साफ करता चलूँ कि यह राजनीति शब्द ही आज तक मेरी हलक से नीचे नहीं उतरा। अरे भई लोकतन्त्र में लोकनीति होनी चाहिए न कि राजनीति? परंतु इस पर आज तक किसी ने कोई चर्चा ही नहीं की।
खैर! मैं बात कर रहा था सियासी पैंतरे बाजियों की, अपने देश में इस समय कुछ महत्वपूर्ण राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं जिसमें सबसे महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री जी का गृह राज्य गुजरात है, उसके अलावा अभी से ही कांग्रेस और भाजपा ने 2024 में होने वाले संसदीय चुनावों का भी बिगुल फूँक दिया है। राज्यस्तरीय दलों में बिहार एवं बंगाल भी काफी सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। चूंकि देश की बागडोर संभालना प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होना लगभग सभी राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं का सपना होता है। इस लिए सभी लोग जोड़ तोड़ में लगे हुए हैं। अब देखना यह है कि यह सियासी ऊंट आखिर किस करवट बैठता है?
जैसा कि हर बार के संसदीय चुनाव में देखने को मिलता है कि भाजपा और कांग्रेस की ही सीधी टक्कर होती है, क्योंकि यही दोनों ही राष्ट्रीय स्तर के दल हैं, बाक़ी सब अपने अपने राज्यों एवं अपनी अपनी जतियों की ही राजनीति करते हैं। आज तक भाजपा की एकमात्र यही कोशिश रही है कि वह कांग्रेस को सीधे अपनी टक्कर में न आने दे, और इसके लिए वह कोई भी पैंतरा इस्तेमाल करने से बाज़ नहीं आती है। चूंकि भाजपा ने राजनीति को इवैंट बना दिया है इस लिए वह हर चुनाव को यहाँ तक कि उसके हिसाब से महत्वपूर्ण राज्यों के निकाय चुनावों को भी बहुत गंभीरता से लड़ती है। जहां दूसरे दल चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद सक्रिय होते हैं वहीं भाजपा साल के बारह महीने चुनावी मोड में रहती है। और यही उसकी कामयाबी का राज़ है, जहां सभी राजनीतिक दल भाजपा की बहुत सी गलतियों को मुद्दा नहीं बना पाते हैं और उसे घेरने में नाकाम रहते हैं, वहीं भाजपा सत्ता में आने से पहले से ही बहुत अधिक सक्रिय राजनीति करती आई है। इस लिए आज भी वह विपक्ष की छोटी से छोटी बातों को नज़रअंदाज़ नहीं करती है, और विपक्ष को बुरी तरह घेर लेती है। जिसका आज नतीजा यह हुआ है कि इस समय पूरे देश में विपक्ष बिलकुल लाचार और बेबस दिखाई पद रहा है।
राहुल गांधी और ओवेसी दो ही ऐसे व्यक्ति हैं जो हमेशा भाजपा से सीधी टक्कर लेते दिखाई देते हैं मगर उनकी आवाज़ भी नक्कार खाने में तूती की आवाज़ से अधिक नहीं हो पाई है। मगर वह दूसरे नेताओं की तरह खामोश नहीं बैठ गए हैं, जनता के हितों की बात बहुत बेबाकी से उठाते रहते हैं। मगर ओवेसी साहब के ऊपर भाजपा की बी टीम का ऐसा ठप्पा लगा कि जिन मुसलमानों की वह लड़ाई लड़ते हैं वही उनसे किनारा किए रहते हैं। वैसे ही राहुल गांधी और कांग्रेस की ऐसी छवि बनवा दी गई है कि न चाहते हुए भी कांग्रेस उस से बाहर नहीं निकाल पा रही है।
भारत का आम जन वोट देने के मामले में अधिक गौर ओ फिक्र करने का आदि नहीं है, वोट देते समय वह ज़्यादा दिमाग़ नहीं खपाता है, और न ही यह सोचता है कि उसके वोट का क्या असर उसके जीवन पर पड़ेगा। यदि सरकार की तरफ से प्रचार न किया जाए तो लोग वोटिंग करने जाएँ भी न। जनता की इस नब्ज़ को भाजपा ने समझ लिया है, और वह यह भी भलीभाँति समझ चुकी है कि देश की जनता उत्सव की शौकीन है, इस मोदी जी जनता के लिए उत्सव के कोई न कोई अवसर रोज़ लाते रहते हैं। उनके छोड़े बाणों में आम जन तो बड़े बड़े बुद्धिजीवी लोग भी तर्क वितर्क में उलझ जाते हैं और देश की बहुत सी अहम समस्याओं पर चर्चा हो ही नहीं पाती। जैसे अभी हाल ही में चीता उत्सव पूरे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जिसमें एक से एक बुद्धिजीवी अपने तर्कवितर्क देते नज़र आए।
राहुल गांधी आजकल देशाटन पर हैं, बहुत अच्छी बात है। और यह भी हक़ीक़त है कि जनता उनपर बेपनाह प्यार लूटा रही है, परंतु यह प्यार आगामी संसदीय चुनाव में वोट में तब्दील होंगे या नहीं? क्योंकि जैसा मैं पहले ही बता चुका हूँ कि यहाँ की जनता छवि पर अधिक ध्यान देती है, इस लिए वह राहुल को एक अच्छा इंसान तो मानती है परंतु एक अच्छा नेता नहीं मानती। उसको लगता है कि नेता के रूप में मोदी जी राहुल से बेहतर हैं। इस लिए कांग्रेस को अभी बहुत मेहनत करने की ज़रूरत है, छोटी छोटी बातों को मुद्दा बनाना भाजपा से सीखना होगा। जनता के दिलों पर राज करने के लिए मोदी जी जैसा आभामंडल बनाना होगा। अपनी गलतियों को भी जनता के लाभ की वस्तु साबित करना होगा।
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