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सोमवार, 26 सितंबर 2022

एक्स मुस्लिम

 आजकल एक नया सियासी मुद्दा उछाला गया है एक्स मुस्लिम । दरअसल जब से मक्का में इस्लाम का वजूद आया और हज़रत मुहम्मद सल0 ने अल्लाह की वहदानियत का ऐलान किया उसी दिन से इस्लाम का विरोध शुरू हो गया है। यह कोई नई बात नहीं है। हर जमाने में लोग इस्लाम के खिलाफ जाते रहे हैं। मुहम्मद सल0 के विसाल के फौरन बाद मुसयलमा ने अपनी नुबुव्वत का ऐलान कर दिया था उसी समय एक महिला सुवैद बिंत सजाह ने भी यह एलान किया कि अल्लाह मुहम्मद सल0 के बाद मर्द नबी नहीं भेजेगा हाँ औरत नबिया हो सकती है, हालांकि अंत में वह मुसयलमा के झांसे में आ गई और सऊदी अरब के रियाद शहर से 150 किमी दक्षिण एक गाँव अस्फ़ल बातिन जो कि होता बनी तमीम तहसील के अंतर्गत आता है वहीं उसका निकाह मुसयलमा के साथ हो गया और बाद में मुसयलमा ने उसको धोखा दे दिया जिसके बाद वह फिर इस्लाम में वापस आ गई, फिर सारी ज़िंदगी गुमनामी में और अल्लाह से अपने गुनाहों की तौबा में बिताई। और यही मुसयलमा रहती दुनिया तक कज़्ज़ाब यानि झूठा के नाम से जाना जाता रहेगा।

अगर आप एक्स मुस्लिम को गूगल करेंगे तो एक बहुत लंबी लिस्ट आपको दिखेगी, जिनमें एक से एक मशहूर हस्तियाँ शामिल हैं, जब उनका बयोडेटा पढ़ेंगे तो साफ लगेगा कि वह किसी न किसी लालच में इस्लाम से फिरे हैं। उदाहरण के लिए मैं कुछ नाम दे रहा हूँ, जैसे जॉर्डन की अमीना दावूद अलमुफ़्ती जो यहूदी बनीं और बाद में जॉर्डन में मोसाद की एजेंट रहीं। ईरान के रज़ा जाबरी जिन्होने इस्राइल के लिए ईरानी जहाज़ हाइजैक किया था। अब्बासी खलीफा अलमुतवक्किल के बेटे अलमुयय्येद ईसाई धर्म अपना चुके हैं, वैसे ही इंडोनसियन प्रधानमंत्री आमिर जफरुद्दीन ने 1931 में ईसाई धर्म अपनाया। हरीलाल गांधी ने पहले इस्लाम अपनाया उसके बाद फिर हिन्दू धर्म में चले गए। 

ऐसे ही पूरी दुनिया में लाखों लोग होंगे जो किसी न किसी कारणवश इस्लाम छोड़ कर दूसरे धर्मों में चले गए मगर गौर करने की बात यह है कि इससे इस्लाम धर्म पर क्या फर्क पड़ा? जब आप इतिहास उठा कर देखिएगा तो पता चलेगा कि उससे बिलकुल कोई फर्क नहीं पड़ा। इस्लाम छोडने वालों से अधिक लोग इस्लाम धर्म को अपना रहे हैं। हाँ अपनाने वाले वही हैं जो इस्लाम कि शिक्षाओं को पढ़ते हैं, वरना आज आप किसी मुस्लिम के साथ रहेंगे या उसको देखेंगे तो इस्लाम से कभी प्रभावित नहीं हो सकते। इस लिए कि इस्लाम इन्सानों से चाहता क्या है यह आप आज के मुसलमानों में बिलकुल देखने को नहीं पाएंगे। 

इस्लाम छोड़ कर जाने वालों के बारे में अल्लाह सुब0 ने क़ुरआन की सूरह 3 आयत 144 में खुल कर बता दिया है कि:

وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌۭ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ ٱلرُّسُلُ ۚ أَفَإِي۟ن مَّاتَ أَوْ قُتِلَ ٱنقَلَبْتُمْ عَلَىٰٓ أَعْقَـٰبِكُمْ ۚ وَمَن يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ فَلَن يَضُرَّ ٱللَّهَ شَيْـًۭٔا ۗ وَسَيَجْزِى ٱللَّهُ ٱلشَّـٰكِرِينَ ١٤٤ 

अर्थात मुहम्मद भी वैसे ही रसूल हैं जैसे इससे पहले मैंने दूसरे रसूलों को पैदा किया है, अगर वह मर जाते हैं या कत्ल कर दिये जाते हैं तो क्या तुम अपने पीछे को वापस हो जाओगे? और अगर तुम पीछे को पलट जाते हो तो अल्लाह को रत्ती भर नुकसान नहीं होगा। और अल्लाह शुक्र करने वालों को अच्छा बदला देता है। 

अब आप इसकी रोशनी में इतिहास उठा कर देखिये, दुनिया की सबसे एडवांस तकनीक वाली इस्राइल की सेना जिससे पिछले 50 सालों से फलस्तीन के लोग गुलेल से लड़ रहे हैं। अम्रीका जो कि आधुनिक इस्लामोफोबिया का जनक है, आज वह कहाँ है और इस्लाम कहाँ है, हाल यह हुआ है कि जल्द ही उसने एक कमेटी बनाई है जो दुनिया भर में इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देने वालों पर नज़र रखेगी, और उनके खिलाफ कार्यवाही करेगी।  अपने देश भारत में ही पिछले दशक का इतिहास उठा कर देखें, आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, जैसे पता नहीं कितने थे जो सुबह शाम मुसलमानों के खिलाफ जहर उगला करते थे, उस जमाने में रोज़ सुबह का अखबार देश के किसी न किसी शहर में होने वाले दंगे की खबरों से भरे होते थे। वह सारे लोग अब कहाँ हैं और मुसलमान वहीं का वहीं है। दरअसल मुसलमान एक सीढ़ी की तरह है जिस पर चढ़ कर लोग कामयाबी की मंज़िल पा जाते हैं, आप चाहे इस्लाम का विरोध करें या समर्थन। हमेशा एक कहावत याद रखिए कि जिसको अल्लाह रखे उसको कौन चखे? 

रविवार, 25 सितंबर 2022

दुकानदार की दुआ

दोस्तो कल मैं ने राजनीति पर एक पोस्ट डाली थी, आज कुछ हंसी हो जाए। इस ब्लॉग पर हर तरह का मसाला मिलेगा। हमारी पूरी कोशिश होगी कि हमसे जुड़े लोग बोर न होने पाएँ ।  


लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

कम किसी तरह न दौलत हो खुदाया मेरी ॥ 

हो मेरा काम हर एक शय में मिलावट करना 

कोई भी चीज़ हो हर चीज़ को चौपट करना ॥

क्या ज़रूरत है कि मैं लाल ओ जवाहर बेचूँ

इतना मंहगा हो कि गेंहु को मैं गिनकर बेचूँ ॥

*निर्ख हर चीज़ का कुछ और भी *बाला हो जाए 

चाहे दो रोज़ में जनता का दिवाला हो जाए ॥

नफ़ाखोरी से रहे मुझको मुहब्बत या रब

कुछ बिगाड़ें न मेरा अहले हुकूमत या रब ॥

मेरी मुंछों पे रहे यूंही हमेशा ताव 

डालडा बेच दूँ मैं घी से भी ऊंचे भाव ॥

मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको

चोर बाजारी के रस्ते पे चलाना मुझको ॥

नाम हल्दी का हो रंगीन बुरादा बेचूँ

खा के पेचिश हो जिसे सबको वह आटा बेचूँ ॥


नाक रगड़ें मेरी चौखट पे जमाने वाले

खुद ही मिट जाएँ मेरा ज़ोर मिटाने वाले ॥

*निर्ख = मूल्य 

*बाला = ऊंचा 


शनिवार, 24 सितंबर 2022

सियासी ऊंट


कलमबाज़......  

भारत में जैसे जैसे चुनाव करीब आने लगते हैं, चुनाव चाहे संसदीय हों या फिर राज्यस्तरीय, राजनीतिक दलों की पैंतरे बाज़ियाँ शुरू हो जाती हैं। लगभग सभी दल अपने अपने स्तर से जनता को लुभाने के प्रयास करना आरंभ कर देते हैं। हर नेता अपने नित नए बयानों एवं हरकतों के माध्यम से जनता को कुछ न कुछ संदेश देता नज़र आता है। 

जब से भाजपा सत्ता में आई है राजनीति एक इवैंट बन कर रह गई है। सबसे पहले मैं यह साफ करता चलूँ कि यह राजनीति शब्द ही आज तक मेरी हलक से नीचे नहीं उतरा। अरे भई लोकतन्त्र में लोकनीति होनी चाहिए न कि राजनीति? परंतु इस पर आज तक किसी ने कोई चर्चा ही नहीं की। 

खैर! मैं बात कर रहा था सियासी पैंतरे बाजियों की, अपने देश में इस समय कुछ महत्वपूर्ण राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं जिसमें सबसे महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री जी का गृह राज्य गुजरात है, उसके अलावा अभी से ही कांग्रेस और भाजपा ने 2024 में होने वाले संसदीय चुनावों का भी बिगुल फूँक दिया है। राज्यस्तरीय दलों में बिहार एवं बंगाल भी काफी सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। चूंकि देश की बागडोर संभालना प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होना लगभग सभी राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं का सपना होता है। इस लिए सभी लोग जोड़ तोड़ में लगे हुए हैं। अब देखना यह है कि यह सियासी ऊंट आखिर किस करवट बैठता है? 

जैसा कि हर बार के संसदीय चुनाव में देखने को मिलता है कि भाजपा और कांग्रेस की ही सीधी टक्कर होती है, क्योंकि यही दोनों ही राष्ट्रीय स्तर के दल हैं, बाक़ी सब अपने अपने राज्यों एवं अपनी अपनी जतियों की ही राजनीति करते हैं। आज तक भाजपा की एकमात्र यही कोशिश रही है कि वह कांग्रेस को सीधे अपनी टक्कर में न आने दे, और इसके लिए वह कोई भी पैंतरा इस्तेमाल करने से बाज़ नहीं आती है। चूंकि भाजपा ने राजनीति को इवैंट बना दिया है इस लिए वह हर चुनाव को यहाँ तक कि उसके हिसाब से महत्वपूर्ण राज्यों के निकाय चुनावों को भी बहुत गंभीरता से लड़ती है। जहां दूसरे दल चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद सक्रिय होते हैं वहीं भाजपा साल के बारह महीने चुनावी मोड में रहती है। और यही उसकी कामयाबी का राज़ है, जहां सभी राजनीतिक दल भाजपा की बहुत सी गलतियों को मुद्दा नहीं बना पाते हैं और उसे घेरने में नाकाम रहते हैं, वहीं भाजपा सत्ता में आने से पहले से ही बहुत अधिक सक्रिय राजनीति करती आई है। इस लिए आज भी वह विपक्ष की छोटी से छोटी बातों को नज़रअंदाज़ नहीं करती है, और विपक्ष को बुरी तरह घेर लेती है। जिसका आज नतीजा यह हुआ है कि इस समय पूरे देश में विपक्ष बिलकुल लाचार और बेबस दिखाई पद रहा है। 

राहुल गांधी और ओवेसी दो ही ऐसे व्यक्ति हैं जो हमेशा भाजपा से सीधी टक्कर लेते दिखाई देते हैं मगर उनकी आवाज़ भी नक्कार खाने में तूती की आवाज़ से अधिक नहीं हो पाई है। मगर वह दूसरे नेताओं की तरह खामोश नहीं बैठ गए हैं, जनता के हितों की बात बहुत बेबाकी से उठाते रहते हैं। मगर ओवेसी साहब के ऊपर भाजपा की बी टीम का ऐसा ठप्पा लगा कि जिन मुसलमानों की वह लड़ाई लड़ते हैं वही उनसे किनारा किए रहते हैं। वैसे ही राहुल गांधी और कांग्रेस की ऐसी छवि बनवा दी गई है कि न चाहते हुए भी कांग्रेस उस से बाहर नहीं निकाल पा रही है। 

भारत का आम जन वोट देने के मामले में अधिक गौर ओ फिक्र करने का आदि नहीं है, वोट देते समय वह ज़्यादा दिमाग़ नहीं खपाता है, और न ही यह सोचता है कि उसके वोट का क्या असर उसके जीवन पर पड़ेगा। यदि सरकार की तरफ से प्रचार न किया जाए तो लोग वोटिंग करने जाएँ भी न। जनता की इस नब्ज़ को भाजपा ने समझ लिया है, और वह यह भी भलीभाँति समझ चुकी है कि देश की जनता उत्सव की शौकीन है, इस मोदी जी जनता के लिए उत्सव के कोई न कोई अवसर रोज़ लाते रहते हैं। उनके छोड़े बाणों में आम जन तो बड़े बड़े बुद्धिजीवी लोग भी तर्क वितर्क में उलझ जाते हैं और देश की बहुत सी अहम समस्याओं पर चर्चा हो ही नहीं पाती। जैसे अभी हाल ही में चीता उत्सव पूरे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जिसमें एक से एक बुद्धिजीवी अपने तर्कवितर्क देते नज़र आए। 

राहुल गांधी आजकल देशाटन पर हैं, बहुत अच्छी बात है। और यह भी हक़ीक़त है कि जनता उनपर बेपनाह प्यार लूटा रही है, परंतु यह प्यार आगामी संसदीय चुनाव में वोट में तब्दील होंगे या नहीं? क्योंकि जैसा मैं पहले ही बता चुका हूँ कि यहाँ की जनता छवि पर अधिक ध्यान देती है, इस लिए वह राहुल को एक अच्छा इंसान तो मानती है परंतु एक अच्छा नेता नहीं मानती। उसको लगता है कि नेता के रूप में मोदी जी राहुल से बेहतर हैं। इस लिए कांग्रेस को अभी बहुत मेहनत करने की ज़रूरत है, छोटी छोटी बातों को मुद्दा बनाना भाजपा से सीखना होगा। जनता के दिलों पर राज करने के लिए मोदी जी जैसा आभामंडल बनाना होगा। अपनी गलतियों को भी जनता के लाभ की वस्तु साबित करना होगा।